भारतीय सिंधु सभा: इतिहास, उद्देश्य और समाजसेवा की प्रेरणादायक यात्रा
परंपराओं एवं मूल्यों के संरक्षण, संवर्धन और सशक्तिकरण के लिए समर्पित भारत के
सबसे बड़े और प्रतिष्ठित सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में से एक है।
सिंधियों को भारत तथा विश्वभर में एक सूत्र में जोड़ने के उद्देश्य से स्थापित यह संस्था
सांस्कृतिक गौरव, सामाजिक उत्तरदायित्व, शैक्षणिक उन्नति तथा राष्ट्रसेवा को प्रोत्साहित
करने का एक सशक्त मंच है।
स्थापना एवं प्रेरणा
भारतीय सिंधु सभा की स्थापना का आधार
स्वर्गीय श्री झामटमल वाधवानी,
स्वर्गीय श्री हाशु आडवाणी,
स्वर्गीय श्री होतचंद गोपालदास आडवाणी तथा
श्री लालकृष्ण (एल.के.) आडवाणी
जैसे दूरदर्शी एवं समर्पित व्यक्तित्वों की प्रेरणा और अथक प्रयास रहे हैं।
इन महान विभूतियों ने विभाजन के पश्चात सिंधी समाज की पहचान, एकता एवं सांस्कृतिक
विरासत को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से इस संगठन की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारतीय सिंधु सभा की स्थापना का मूल विचार
जनवरी 1978 में इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) में आयोजित
कुंभ मेले के दौरान जन्मा।
देशभर से आए 48 प्रतिष्ठित सिंधी चिंतकों, बुद्धिजीवियों एवं समाजसेवियों ने विभाजन के
बाद सिंधी समाज के भविष्य पर गंभीर चिंतन किया और सर्वसम्मति से एक राष्ट्रीय संगठन
की स्थापना का संकल्प लिया।
सभा के मूल उद्देश्य
भारतीय सिंधु सभा के मूल सिद्धांत हैं—
- चरित्र निर्माण
- अनुशासन
- एकता
- समाज सेवा
- सांस्कृतिक संरक्षण
- राष्ट्रीय एकात्मता
सभा का विश्वास है कि एक सशक्त समाज का निर्माण मजबूत मूल्यों पर होता है।
इसलिए यह प्रत्येक सदस्य को समाज के कल्याण के लिए सक्रिय रूप से कार्य करने तथा
अपनी सिंधी विरासत से जुड़े रहने के लिए प्रेरित करती है।
सदस्यता
भारतीय सिंधु सभा की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक यह है कि
सदस्य बनने के लिए केवल एक ही पात्रता है—
व्यक्ति सिंधी होना चाहिए।
आयु, व्यवसाय, लिंग, सामाजिक स्थिति अथवा राजनीतिक विचारधारा की परवाह किए बिना
प्रत्येक सिंधी, जो सभा के उद्देश्यों एवं आदर्शों में विश्वास रखता है,
संगठन से जुड़कर समाज के विकास में अपना योगदान दे सकता है।
सांस्कृतिक एवं सामाजिक गतिविधियाँ
सभा सिंधी भाषा, साहित्य, संस्कृति, त्योहारों एवं परंपराओं के संरक्षण और प्रचार-प्रसार
हेतु निरंतर कार्यरत है।
संस्था नियमित रूप से निम्न प्रमुख कार्यक्रमों का आयोजन करती है:
- हेमू कालाणी बलिदान दिवस (21 जनवरी)
- चेटी चंड
- सिंधी भाषा दिवस (10 अप्रैल)
- महाराजा दाहरसेन बलिदान दिवस (16 जून)
- सिंधु स्मृति दिवस (14 अगस्त)
- रक्षाबंधन
- दशहरा
- दीपावली
- लाल साईं उत्सव
- होली मिलन
- अन्य सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम
राष्ट्रीय स्तर पर संगठन
वर्तमान में भारतीय सिंधु सभा की पूरे भारत में
345 शाखाएँ कार्यरत हैं।
सामान्यतः प्रत्येक शहर में तीन शाखाएँ संचालित होती हैं—
- मुख्य शाखा
- महिला शाखा
- युवा शाखा
ये तीनों शाखाएँ मिलकर सिंधियत के संरक्षण, संवर्धन तथा समाज के सर्वांगीण विकास
के लिए निरंतर कार्य करती हैं।
समाजसेवा के प्रमुख कार्य
सांस्कृतिक गतिविधियों के अतिरिक्त भारतीय सिंधु सभा अनेक सामाजिक सेवा कार्यों का
संचालन भी करती है, जिनमें प्रमुख हैं—
- शैक्षणिक सहायता एवं छात्रवृत्तियाँ
- चिकित्सा शिविर एवं स्वास्थ्य सेवाएँ
- राहत एवं आपदा सहायता कार्य
- युवा नेतृत्व विकास कार्यक्रम
- महिला सशक्तिकरण
- वरिष्ठ नागरिक कल्याण
- सामुदायिक विकास परियोजनाएँ
राष्ट्रीय, प्रांतीय, जिला एवं स्थानीय समितियों के सुव्यवस्थित नेटवर्क के माध्यम से
यह संगठन सेवा, एकता एवं राष्ट्र निर्माण के मूल्यों को निरंतर आगे बढ़ा रहा है।




