प्रकृति का प्रकोप या हमारी विकास नीति की विफलता?
पिंपरी-चिंचवड़ में हुई मूसलाधार बारिश ने केवल एक प्राकृतिक आपदा का रूप नहीं लिया, बल्कि इसने हमारे तथाकथित विकास मॉडल, प्रशासनिक व्यवस्था, शहरी नियोजन और पर्यावरणीय उपेक्षा की वास्तविकता को भी उजागर कर दिया। मोशी स्थित कचरा प्रबंधन केंद्र में कचरे के विशाल ढेर का ढह जाना, प्रशासनिक भवन का मलबे में तब्दील हो जाना, कर्मचारियों का उसमें फंस जाना तथा पवना और इंद्रायणी नदियों के उफान से हजारों परिवारों का बेघर होना केवल दुर्घटनाएं नहीं हैं। ये उन वर्षों की अनदेखी का परिणाम हैं, जिनमें विकास के नाम पर प्रकृति के साथ निरंतर समझौता किया गया।
मोशी के वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट में 60 मीटर ऊंचे कचरे के ढेर का बारिश के कारण खिसककर तीन मंजिला प्रशासनिक भवन पर गिर जाना अत्यंत गंभीर और चिंताजनक घटना है। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि कचरे का इतना विशाल ढेर वर्षों से मौजूद था, तो उसकी नियमित तकनीकी जांच, सुरक्षा मूल्यांकन और जोखिम प्रबंधन क्यों नहीं किया गया? क्या संबंधित विभाग और अधिकारी किसी बड़ी दुर्घटना की प्रतीक्षा कर रहे थे? यदि समय रहते आवश्यक कदम उठाए गए होते, तो शायद यह हादसा टाला जा सकता था।
दूसरी ओर, पवना और इंद्रायणी नदियों में आई बाढ़ ने यह स्पष्ट कर दिया कि शहर का विकास प्राकृतिक सीमाओं की अनदेखी करके किया गया है। नदियों के किनारे बढ़ते अतिक्रमण, जलनिकासी मार्गों का संकरा होना, कंक्रीट के बढ़ते जंगल, हरित क्षेत्र का लगातार कम होना तथा वर्षा जल के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित करने वाली निर्माण गतिविधियां आज शहर के लिए अभिशाप बन चुकी हैं।
विकास का अर्थ केवल ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें और बड़े-बड़े प्रकल्प नहीं होता। वास्तविक विकास वह है जिसमें पर्यावरण संरक्षण, सुरक्षित शहरी नियोजन और भविष्य की प्राकृतिक चुनौतियों का वैज्ञानिक आकलन शामिल हो। दुर्भाग्य से आज अनेक शहरों में विकास की दिशा ठेकेदारों के हितों के अनुरूप तय होती दिखाई देती है, न कि नागरिकों की सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखकर।
शहर नियोजन विभाग की दूरदर्शिता का अभाव भी इस आपदा के पीछे एक बड़ा कारण है। यदि मास्टर प्लान बनाते समय जलभराव वाले क्षेत्रों, नदी के प्राकृतिक प्रवाह, जलनिकासी तंत्र और बढ़ती आबादी का समुचित अध्ययन किया गया होता, तो आज हजारों लोगों को अपने घर छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेने की नौबत नहीं आती।
आज आवश्यकता इस बात की भी है कि सार्वजनिक धन का उपयोग प्राथमिकता के आधार पर किया जाए। जिन कार्यों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, क्या वे वास्तव में नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं से जुड़े हैं? शहर को सुरक्षित जलनिकासी व्यवस्था, मजबूत तटबंध, नदी संरक्षण, वर्षा जल प्रबंधन, कचरा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता है। यदि इन मूलभूत कार्यों की अनदेखी कर केवल दिखावटी परियोजनाओं पर धन खर्च किया जाएगा, तो ऐसी त्रासदियां भविष्य में और अधिक गंभीर रूप लेंगी।
प्रकृति कभी अन्याय नहीं करती, वह केवल मनुष्य द्वारा किए गए अन्याय का उत्तर देती है। नदियों के प्राकृतिक मार्गों पर अतिक्रमण, हरित क्षेत्रों का विनाश, अनियोजित शहरीकरण और पर्यावरणीय नियमों की लगातार उपेक्षा का परिणाम आज हमारे सामने है। यदि आज भी हमने इससे सबक नहीं लिया, तो आने वाले वर्षों में ऐसी घटनाएं और अधिक भयावह रूप धारण कर सकती हैं।
अब समय केवल राहत और बचाव कार्यों तक सीमित रहने का नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि इस पूरी घटना की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच हो, जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों की जवाबदेही तय की जाए तथा भविष्य के लिए ऐसी ठोस नीति बनाई जाए, जिसमें पर्यावरण संरक्षण, वैज्ञानिक शहरी नियोजन और नागरिक सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता हो।
प्रकृति के साथ संघर्ष करके कोई भी शहर सुरक्षित नहीं बन सकता। विकास तभी सार्थक होगा जब वह पर्यावरण के साथ संतुलन बनाकर किया जाए। अन्यथा कंक्रीट के जंगल चाहे जितने ऊंचे बन जाएं, वे एक दिन प्रकृति के सामने धराशायी हो ही जाएंगे।
— कार्यकारी संपादक
संदीपकुमार कैलास जाधव




